मथुरा में इस अंदाज में मनाई जाती है लट्ठमार होली, जानिए कैसे शुरू हुई ये परंपरा और क्या है इसका महत्व

होली पूरे देश में इस त्यौहार को उत्साह के साथ धूमधाम से मनाया जाता है। लेकिन उत्तर प्रदेश के मथुरा में इस त्यौहार की खास मान्यताएं हैं। यहां की होली देश के साथ-साथ विदेशों में भी काफी प्रसिद्ध है।

LathMar holi
मथुरा की लट्ठमार होली खेलते हुए अक्षय कुमार और भूमि पेडनेकर। (फोटोःयूट्यूब स्टिल)

इस बार होली का पवित्र त्यौहार 21 मार्च को है। वैसे तो होली पूरे देश में इस त्यौहार को उत्साह के साथ धूमधाम से मनाया जाता है। लेकिन उत्तर प्रदेश के मथुरा में इस त्यौहार की खास मान्यताएं हैं। यहां की होली देश के साथ-साथ विदेशों में भी काफी प्रसिद्ध है। यहां होली मनाने और यहां होली का जश्न देखने के लिए देश-विदेश से लोग आते हैं। इसके लोगों का जमावड़ा होली के कई दिन पहले से ही लगना शुरू हो जाता है। इसकी वजह है यहां कि लट्ठ मार होली।

मथुरा, वृंदावन, ब्रज और बरसाने में इन दिनों की बात की कुछ और होती है। यहां होली के कई दिन पहले से ही लट्ठमार होली का जश्न शुरू हो जाता है। आपने फिल्म ‘टॉयलेटः एक प्रेम कथा’ देखी होगी, उसमें एक सॉन्ग  इसी लट्ठमार होली पर आधारित है। इस फिल्म में ही नहीं बल्कि कई फिल्मों में बरसाने और नंदगांव की होली के महत्व को दिखाया गया है। यहां हम आपको बताएंगे मथुरा में लट्ठ मार होली की शुरूआत कैसी हुई और इस अंदाज में क्योंकि मनाई जाती है।

इस दिन मनाई जाती है लट्ठमार होली
आपको बता दें कि मथुरा के बरसाना में फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को लट्ठमार होली मनाई जाती है। बरसाना में इस होली का काफी महत्व है। लट्ठमार होली में एक पत्नी अपने पति को और एक प्रेमिका अपने प्रेमी का लट्ठ मारती है। लेकिन पति या प्रेमी के एक ढाल रहती है, जिससे वह अपना बचाव करता है। ऐसा माना जाता है कि महिलाओं के लिए ये दिन बहुत खास होता है। इस गली और गांव की महिलाएं एक साथ घर के बाहर निकल कर अपने पति या प्रेमी के साथ लट्ठमार होली खेल कर प्यार जताती है। होलिका दहन के बाद फिर रंग से होली खेली जाती है।

लट्ठमार होली की ये है मान्यता
मथुरा के बरसाने में लट्ठमार होली की परंपरा द्वापर युग यानि कृष्ण और राधा के बीच जब प्रेम हुआ, तबसे चली आ रही है। माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण बरसाना जाकर राधा और उनकी सहेलियों के संग होली खेलने जाते थे। लेकिन वहां राधा और उनकी सहेलियां श्रीकृष्ण को रंग लगाने से मना करती थी और लाठी-डंडे से मजाकिया तौर पर मारती थीं। और ये लोग अपना बचाव करते थे। लेकिन बाद में लड़कियां रंग लगवा लेती थी। इसके बाद से ही नंदगाव और बरसाना में लट्ठमार होली की परंपरा शुरू हो गई जोकि आजतक जारी है।

लट्ठमार होली में जीतने के बाद करते हैं राधा-कृष्णा की पूजा
बरसाना में हर साल फागुन के शुक्ल पक्ष की नवमी को दोपहर से ही लट्ठमार होली का आगाज हो जाता है और शाम तक लोग चलता है। इस दौरान जब महिलाएं जिन्हें गोपियां कहा जाता है मारते-मारते थक जाती हैं तो वह अपने पति या प्रेमी जिन्हें हुरियारे कहा जाता है, से माफी मांगती हैं। ठीक ऐसा ही पुरुष करते हैं। अगर वे थक जाते हैं तो वो गोपियों से माफी मांगते हैं। इस तरह एक-दूसरे से जीतने वाले को दोनों बधाई देते हैं। महिलाएं जीतने पर राधा-कृष्णा मंदिर जाकर पूजा करती हैं और पुरुष भी ऐसा करते हैं।

यहां देखिए आज की खास खबरों का वीडियो…

Leave a Reply